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पिता की अर्थी को 4 बेटियों ने दिया कंधा, पाचवीं ने किया अंतिम संस्कार

वक्त के साथ समाज की सोच भी बदल रही है। बेटियां पिता की अर्थी को कंधा देने के साथ ही मुखाग्नि दे रही हैं। ऐसा ही नजारा घुघसीडीह में देखने को मिला। गांव में पहली बार परंपराओं से हटकर एक बेटी ने अपने पिता को मुखाग्नि देकर उनका अंतिम संस्कार किया। मृतक का कोई बेटा नहीं था, बल्कि पांच बेटियां थीं। जानकारी के अनुसार घुघसीडीह में 68 वर्षीय राधेश्याम ठाकुर का बीमारी के चलते रविवार को निधन हो गया। उनका कोई बेटा नहीं है। स िर्फ 5 बेटियां मालती, नीरा, रमौतिन, कीर्तिन और राधिका है। जिनमें से राधिका सबसे छोटी है। उनकी शादी नहीं हुई है। एक पैर से विकलांग भी है। वह अपने माता-पिता के साथ ही रहती थी। स्कूल में रसोइया का काम कर अपना व बुजुर्ग माता पिता की पेट पालती है। बेटा नही होने के कारण पांचों बेटियों ने अर्थी को कंधा दिया और अंतिम संस्कार की सारी रस्में पूरी कर राधिका ने मुखाग्नि दी। उन्होंने बेटी होकर भी बेटे की तरह जिम्मेदारी पूरी कर गांव में एक मिसाल कायम की। जिसे देखकर ग्रामीणों ने कहा कि समय के साथ सोच बदलने की जरूरत है। ग्राम घुघसीडीह में पिता की अर्थी काे कांधा देती बेटियां।
लोगों को सोच सिर्फ बदलने की जरूरत
मृतक की प|ी सतरूपा ठाकुर का कहना है कि उसके पिता ने सभी बेटियो को बेटों की तरह पाला है। उनमें कभी भेद-भाव नहीं किया। सभी को अच्छी शिक्षा दिलाई और बालिग होने पर 4 बेटियों की शादी की। छोटी बेटी राधिका की शादी की योजना थी। पर उसके पहले ही वह चल बसे। मौके पर मौजूद सरपंच प्रहलाद चंद्राकर ने कहा कि आज जमाना बदल गया है, पुरानी कुरीतियां रही हैं कि दाह संस्कार का काम केवल बेटे ही कर सकते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं है, जमाना बदल रहा है। जो काम बेटे कर सकते हैं, उस काम को बेटियां भी कर सकती हैं। लोगों को सिर्फ सोच बदलने की जरूरत है।

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